"हर-हर महादेव! जय काशीपुरम्!"

ग्राम काशीपुरम्

                   काशीपुरम् काशी परिक्षेत्र के डोभी ब्लाक में आदि गंगा गोमती जी के तट पर बसा एक छोटा सा गाँव है, जिसका नाम विगत वर्षों में अहिरौली हुआ करता था।

                    काशीपुरम् युवा संगठन के सचिव, आशुतोष कौशिक के अनुसार "हम सब काशीपुरम् वासी ऋषि विश्वामित्र के वंशज है, विश्वामित्र अर्थात सारे विश्व का मित्र। विश्वस्य मित्रः - सः विश्वामित्र।। विश्व जिसका मित्र है, वही विश्वामित्र है। जिनके पूर्वज विश्वामित्र, भृगुवंशी परशुराम एवं भगवन विश्वकर्मा जी सरीखे हों, वो अपनी नैतिकता को भूलकर गर्त में नहीं जा सकते। हमें अपने पूर्वजों के पराक्रम, तपोबल, शक्ति एवं प्रभुता पर गर्व करना चाहिए. इस सन्दर्भ में आशुतोष जी ने कौशिक गोत्र की उत्पत्ति के बारे में श्रीमद्भागवत में उल्लिखित वंशावली का विवरण निम्न प्रकार दिया-

                    विश्वामित्र एवं परशुराम जी के वंश का विवरण: उर्वशी जी के गर्भ से पुरुरवा के छह पुत्र हुए: आयु, श्रुतायु, सत्ययु, रय, विजय और जय. श्रुतायु के पुत्र वसुमान, सत्ययु के श्रुतंजय, रय के एक और जय के अमित. विजय का भीम, भीम का कांचन, कांचन का होत्र, और होत्र के पुत्र थे जहु. जहु वही थे जो गंगा जी को अपनी अंजलि में पी गए थे. जहु के पुत्र थे पुरू, पुरू के बलाक, बलाक के अज़क. अज़क के पुत्र कुश हुए. कुश के चार पुत्र हुए, कुशाम्बु, तनय, वशु और कुशनाभ. इनमे से कुशाम्बु के पुत्र हुए गाधि. यहाँ से प्राम्भ होती है, परशुराम और विश्वामित्र जी के जन्म की कथा:
गाधि की कन्या का नाम था सत्यवती. ऋचिक ऋषि ने गाधि से उनकी कन्या मांगी, गाधि ने ये समझकर की ये कन्या के योग्य वार नहीं है, ऋचीक से कहा- मुनिवर, हम लोग कुशिक (कौशिक) वंश के क्षत्रिय है, और आप ठहरे ब्राह्मण, अतएव हमारी कन्या मिलना कठिन है. कुछ शर्त की प्रतिपूर्ति के बाद ऋचीक और सत्यवती जी का विवाह हो गया. एक दिन सत्यवती जी ने ऋचीक मुनि से अपने एवं अपनी माता के लिए पुत्र की इच्छा ब्यक्त की. अपनी माता के लिए जाती के अनुसार क्षत्रिय एवं अपने लिए ब्राह्मण. (सत्यवती की माता का पुत्र उनका भाई होगा). मुनि द्वारा दिया गया फल बदल जाने की वजह से सत्यवती को जमदग्नि और जमदग्नि को वसुमान आदि कई पुत्र हुए, जिनमे सबसे छोटे परशुराम जी थे, जो फल बदल जाने की वजह से क्षत्रिय कर्म को प्राप्त हुए. उधर सत्यवती जी की पिता गाधि एवं माता जी को अग्नि के सामान परम तेजस्वी विश्वामित्र जी हुए. उन्होंने अपने तपोबल से एक अन्य सृष्टि का निर्माण किया, जिसकी वंशावली के अंतर्गत कौशिक गोत्र के ब्राह्मण एवं क्षत्रिय दोनों ही अपने अपने कर्मानुसार बने. अत्यधिक जानकारी के लिए श्रीमद्भागवत का पञ्चदशोध्याय एवं खोडशोध्याय देखें.
काशीपुरम् युवा संगठन द्वारा आयोजित भरत मिलाप का एक दृश्य

             'हर-हर महादेव!' के साथ साथ 'जय काशीपुरम्!' का उद्घोष यहाँ के वातावरण को पवित्र व् चैतन्यकरता है।

लेकिन मेरा लावारिस दिल...


मस्जिद तो अल्लाह की ठहरी 
मंदिर राम का निकला
लेकिन मेरा लावारिस दिल
अब जिस की जंबील में कोई ख्वाब 
कोई ताबीर नहीं है
मुस्तकबिल की रोशन रोशन
एक भी तस्वीर नहीं है
बोल ए इंसान, ये दिल, ये मेरा दिल
ये लावारिस, ये शर्मिन्दा शर्मिन्दा दिल
आख़िर किसके नाम का निकला 
मस्जिद तो अल्लाह की ठहरी
मंदिर राम का निकला
बंदा किसके काम का निकला
ये मेरा दिल है
या मेरे ख़्वाबों का मकतल
चारों तरफ बस खून और आँसू, चीखें, शोले
घायल गुड़िया
खुली हुई मुर्दा आँखों से कुछ दरवाजे
खून में लिथड़े कमसिन कुरते
जगह जगह से मसकी साड़ी
शर्मिन्दा नंगी शलवारें
दीवारों से चिपकी बिंदी
सहमी चूड़ी 
दरवाजों की ओट में आवेजों की कबरें
ए अल्लाह, ए रहीम, करीम, ये मेरी अमानत
ए श्रीराम, रघुपति राघव, ए मेरे मर्यादा पुरुषोत्तम
ये आपकी दौलत आप सम्हालें
मैं बेबस हूँ
आग और खून के इस दलदल में
मेरी तो आवाज़ के पाँव धँसे जाते हैं।

बारिश की एक सर्द रात...



कोहनियों के ब़ल चलकर
चाँद आज कितना करीब आया है
कांच की खिड़की से सरकती
बारिश की बूंदों की
कतारें और शीशे के इस
पार भीगा हुआ मेरा मन
चांदनी में नहाये हुए कुछ ख्वाब
यादों की चादर भिगोने लगे
आँखों के समंदर में
घुलकर बह निकली एक
तम्मना तुमसे जुड़ने की 'आशु'
थरथराते होटों पे तुम्हारे
लबों का एहसास
एक गर्माहट से भर गयी
सर्द तूफानी रात
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-प्रस्तुतकर्ता
'आशु'