"हर-हर महादेव! जय काशीपुरम्!"

परिचय एवं इतिहास


''ग्राम: काशीपुरम्'' 
               काशी परिक्षेत्र के डोभी ब्लाक में आदि गंगा गोमती जी के तट पर बसे इस छोटे से गाँव का नाम विगत वर्षों में अहिरौली हुआ करता था। जहाँ के बारे में पुरानी किवंदिति थी कि, " सूर्य अस्त, अहिरौली मस्त"। वहां के निवासी आशुतोष कौशिक ने गाँव के युवाओ को नकारात्मकता कि तरफ अग्रसर एवं गाँव कि बिगड़ती परिस्थिति को देखते हुए उस गाँव का नाम काशीपुरम् रखा तथा 'काशीपुरम् युवा संगठन' का निर्माण किया। काशीपुरम् ग्राम में हर जाति के लोगों का सम्मिश्रण है, जिनका आपस में प्रेम और सदभाव सराहनीय है। कौशिक गोत्र के ब्राह्मण लोगों कि बहुलता होने के बावजूद भी यह गाँव काफी समय तक उपेक्षित रहा।
             आशुतोष जी ने काशीपुरम् युवा संगठन के सभी सामाजिक कार्यकर्ताओं कि मदद से गाँव के विकास हेतु, सफाई अभियान, साक्षरता, ब्यायमशाला एवम् कृष्ण जन्माष्टमी, रामलीला, जागरण आदि कार्यों को प्रारम्भ किया। उनका कहना है कि, " हम सब काशीपुरम् वासी ऋषि विश्वामित्र के वंशज है, विश्वामित्र अर्थात सारे विश्व का मित्र। विश्वस्य मित्रः - सः विश्वामित्र।। विश्व जिसका मित्र है, वही विश्वामित्र है। जिनके पूर्वज विश्वामित्र, भृगुवंशी परशुराम एवं भगवन विश्वकर्मा जी सरीखे हों, वो अपनी नैतिकता को भूलकर गर्त में नहीं जा सकते। हमें अपने पूर्वजों के पराक्रम, तपोबल, शक्ति एवं प्रभुता पर गर्व करना चाहिए. इस सन्दर्भ में आशुतोष जी ने कौशिक गोत्र की उत्पत्ति के बारे में श्रीमद्भागवत में उल्लिखित वंशावली का विवरण निम्न प्रकार दिया:
              विश्वामित्र एवं परशुराम जी के वंश का विवरण: 
                                  उर्वशी जी के गर्भ से पुरुरवा के छह पुत्र हुए: आयु, श्रुतायु, सत्ययु, रय, विजय और जय.
श्रुतायु के पुत्र वसुमान, सत्ययु के श्रुतंजय, रय के एक और जय के अमित. विजय का भीम, भीम का कांचन, कांचन का होत्र, और होत्र के पुत्र थे जहु.
                                  जहु वही थे जो गंगा जी को अपनी अंजलि में पी गए थे.
              जहु के पुत्र थे पुरू, पुरू के बलाक, बलाक के अज़क. अज़क के पुत्र कुश हुए.
कुश के चार पुत्र हुए, कुशाम्बु, तनय, वशु और कुशनाभ. इनमे से कुशाम्बु के पुत्र हुए गाधि.
यहाँ से प्राम्भ होती है, परशुराम और विश्वामित्र जी के जन्म की कथा:
             गाधि की कन्या का नाम था सत्यवती. ऋचिक ऋषि ने गाधि से उनकी कन्या मांगी, गाधि ने ये समझकर की ये कन्या के योग्य वार नहीं है, ऋचीक से कहा- मुनिवर, हम लोग कुशिक (कौशिक) वंश के क्षत्रिय है, और आप ठहरे ब्राह्मण, अतएव हमारी कन्या मिलना कठिन है. कुछ शर्त की प्रतिपूर्ति के बाद ऋचीक और सत्यवती जी का विवाह हो गया.
             एक दिन सत्यवती जी ने ऋचीक मुनि से अपने एवं अपनी माता के लिए पुत्र की इच्छा ब्यक्त की. अपनी माता के लिए जाती के अनुसार क्षत्रिय एवं अपने लिए ब्राह्मण. (सत्यवती की माता का पुत्र उनका भाई होगा). मुनि द्वारा दिया गया फल बदल जाने की वजह से सत्यवती को जमदग्नि और जमदग्नि को वसुमान आदि कई पुत्र हुए, जिनमे सबसे छोटे परशुराम जी थे, जो फल बदल जाने की वजह से क्षत्रिय कर्म को प्राप्त हुए.
                 उधर सत्यवती जी की पिता गाधि एवं माता जी को अग्नि के सामान परम तेजस्वी विश्वामित्र जी हुए. उन्होंने अपने तपोबल से एक अन्य सृष्टि का निर्माण किया, जिसकी वंशावली के अंतर्गत कौशिक गोत्र के ब्राह्मण एवं क्षत्रिय दोनों ही अपने अपने कर्मानुसार बने.
                 अत्यधिक जानकारी के लिए श्रीमद्भागवत का पञ्चदशोध्याय एवं खोडशोध्याय देखें.

                 "काशीपुरम् युवा संगठन" के श्री शिवाजी दुबे, श्री उपेन्द्र नाथ दुबे, श्री गोपाल कृष्ण दुबे, श्री शशिभूषण दुबे, श्री उमाकांत दुबे, श्री राजेश दुबे, श्री राजनारायण दुबे, श्री धीरज दुबे, श्री रामाशीष दुबे, श्री रामजी दुबे, श्री विजयभूषण दुबे, श्री रवि विश्वकर्मा जी, श्री रंगनाथ दुबे, श्री कैलाश सोनकर, श्री रमेश विश्वकर्मा, श्री कैलाश विश्वकर्मा, श्री गोविन्द विश्वकर्मा, श्री निजामुद्दीन अंसारी एवं अन्य सभी सामाजिक कार्यकर्ताओं के मार्गदर्शन में यह गाँव धीरे धीरे आदर्श ग्राम की तरह विकास कर रहा है। काशीपुरम् युवा संगठन में निम्न कार्यकर्ताओं का भी अपूर्व योगदान रहा है, जो समाज के विकास के लिए एक आदर्श प्रस्तुत कर रहे हैं: 
           पवन, मुकेश, कृष्ना, अभिषेक, शिब्बू, गौरव, रंजीत, प्रिंस उर्फ़ चन्दन, प्रांशु, सुनील दुबे, मयंक, निखिल, अतुल, अंश, चंद्रभान, इंद्रभान, दीनानाथ, मुख्तार, मोनू, गोलू, ओजस, गुनगुन, लड्डू, बोनी, शनि, अविनाश, सूरज, धीरज, प्रियंक, प्रतीक, अन्नू, बिट्टू, लकी, चीकू, इत्यादि सक्रिय कार्यकर्ता एवम् समाजसेवी।

             हर-हर महादेव के साथ साथ 'जय काशीपुरम्!' का उद्घोष यहाँ के वातावरण को पवित्र व् चैतन्यकरता है। छोटे बालकों द्वारा किया जाने वाला ये उद्घोष पुरे क्षेत्र में धीरे धीरे गुंजायमान होने लगा है। इसी के साथ आप सभी लोगों को "काशीपुरम् युवा संगठन" की तरफ से:
 हर-हर महादेव!
जय काशीपुरम्!

2 comments:

  1. अपनी भावी पीढ़ी के लिए अच्छा प्रयास कर रहे हैं। मैं भी कौशिक गोत्रीय कुम्भी बैस कहलाने वाले बड़गायां परिवार का सदस्य हूँ। हमारी ही जाति भाषाई विभिन्नता के कारण विभिन्न जगहों पर भिन्न-भिन्न नामों से पहचानी जाती है। हमारे ही जाति के जो लोग बारी बैस और बारी ब्राह्मण कहलाते थे कुछ जगहों पर अपभ्रंशित होकर बार्गी, बार्गीयन और बड़गायां भी कहलाते हैं। यह जाति परम्परिक रूप से आज भी शिकारी है अर्थात साहसिक कार्यों में रूचि रखने वाली जाति है, इसके कारण इस जाति के लोगों में रहष्यमयी और रोमाञ्चक कार्यों में भी दिलचस्पी रखने का अनुवांशिक गुण इश्वर प्रदत्त है।
    इस सम्बन्ध में भावी योजनाओं के लिए आशुतोष जी से बात करना चाहता हूँ। अतः कृप्या उनका मोबाइल फोन नम्बर या व्हाट्स एप नम्बर मेरे संलग्न लिंक http://m.me/kaushikfact पर भेजने की कोशिश करें। आपसे यह भी आग्रह है कि मेरे पेज़ http://fb.me/kaushikfact को ज्वॉइन कर के अपने सुझाव आदि भी भेजें। ताकि इस वंश की संघर्ष कथाओं से सम्बन्धित जानकारियों से तो आप अपडेट रहे ही अपने साथ होने वाले अत्याचारों के खिलाफ़ एकजुट होकर आवाज़ भी उठा सकें।
    इस सन्देश को पढ़ने के लिए अपनी बेशकीमती समय देने के लिए आभार।... ॐ

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